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कहानी “उस” कप की

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कहानीउसकप की

एक थी अंधेर नगरी। उस नगरी में प्रचूर मात्रा में कचरा और कचरे का व्यवस्थापन नही हो पाता था, नतीजा उस नगर में भयानक बिमारीयाँ , संक्रमण, बच्चे विकृतियों के साथ पैदा होने लगे थे। भयान प्रदूषण था। औरइस नगरी की गिनी चुनी महिलाओं ने मेन्स्ट्रुअल कप यानीमाहवारी का कपइस्तेमाल करने का व्रत लिया, मैं भी इनमें से एक। करीब साल भर पहले मैं सॅनिटरी नॅपकिन के बजाय माहवारी के भारत में बनाये गयेशीकपका प्रयोग करने लगी। सच मानें इस कप के बारे में एक सहेली ने दो साल पहले ही बता दिया था। पर इस के प्रयोग करने से मुझे एक डर सा लग रहा थाक्या कप शरीर के अंदर चला जायेगा, चुभेगा, असुविधा होगी इत्यादी। लेकिन कुछ ही महीने बाद मुझे आदत हो गयी, फिर तो मैं अपनी सहेलियाँ, बहने, भाभी इन सब को कप की मह्त्ता समझाने लगी। कप के बारे में मराठी में लिखना आरंभ किया। मुझे ढेर सारी प्रतिक्रियायें मिलने लगी। महिलायें और पुरुष भी सवाल पूछ्ने लगे। महाराष्ट्र के कोने कोने से इ मेल आने लगी। कई महिलाएँ ढंग से सवाल भी पूछ नही सकती थीं पर उन्हें कप की जानकारी चाहिये थी। फ़िर मैं उनसे फोन पर बातचीत करती थी। मैं कोई डॉक्टर नही पर खुद के अनुभव और मेरे जैसे कप प्रयोग करनेवाली महिलाओं के अनुभव और महिलाओं को बताने का व्रत मैंने लिया है।

हमारी संस्कृती में माहवारी के विषय पर कोई खुलकर नही बोलता। जब लडकी सयानी होती है तब उसे अपनी स्वच्छता और स्वास्थ कैसे संभाला जाता है इसकी सही जानकारी नही मिलती। २०१० में किये गये एक सर्व्हे के अनुसार भारत में केवल १२ प्रतिशत महिलाएँ सॅनिटरी नॅपकिन इस्तेमाल करती हैं। अगर हर महीने १२ नॅपकिन के हिसाब से गिनती करें तो ४३.२ करोड नॅपकिन का वजन ५०० टन होगा। इन नॅपकिन्स को पूरी तरह डिक्म्पोज या नष्ट करने में सैकडो साल लगते हैं। यानी हम गहराई से सोचें तो हर दिन हम प्रदूषण में कितना योगदान दे रहे हैं? ज्यादा तर शहरों में इनका प्रयोग होता हैं। और हमारे शहरों में ही कूडा हर दिन बढते जा रहा हैं।  जैसे जैसे जनता का जीवनस्तर बढ़ता है वैसे और महिलाएँ भी सॅनिटरी नॅपकिन का प्रयोग करने लगेगी।  बंबई, दिल्ली, बंगलोर जैसे शहरों में कूडा जमा करनेवाले मैदान पूरे भर गये हैं। अगर अभी हमारे शहरों का यह हाल है तो आगे जा कर क्या होगा? मैं सोचने लगी, की क्या इस गंभीर समस्या का कुछ हल हो सकता हैं? जैसे मैं कप  इस्तेमाल करने लगी तो मुझे लगा, की मैं यह बडी समस्या को अपने स्तर पर तो सुलझा सकती हूँ। यह ध्यान में आया की कम से कम मेरा अपना कूडा तो मैंने कम कर दिया है।

folded cup remove cup 5अगर गौर से देखे तो डिस्पोजेबल सॅनिटरी नॅपकिन की जरुरत बनायी गयी है। बीसपच्चीस साल पहले बहुत सारी महिलाएँ कपडा ही इस्तेमाल करती थी। कपडा अगर साफ धोकर धूप में सुखाए तो महिला के स्वास्थ के लिए सबसे अच्छा। लेकिन अगर कपडा ठीक से सुखाया नही तो उससे बदबु आती है और संसर्गजन्य बिमारियाँ हो सकती है। मासिक धर्म के दौरान मूड स्विन्ग्स, कमर दर्द और पेट फुलना आदि परेशानी रहती है। उस पर अगर कपडा भी धोना पड़े तो मुश्किलसा लगता है। गिलापन, रॅशेस, घमोरियाँ की वजह से इन दिनों में महिलाएँ दिन का काम भी ढंगसे नही कर पाती। ऐसे समय पर कोई भी स्त्री डिस्पोजेबल सॅनिटरी नॅपकिन का प्रयोग उचित मानेगी। मगर इन सुविधाजनक नॅपकिन में कई सारे रसायन होते हैं जो एक स्त्री के लिए खतरनाक हो सकते हैं। इस लिए कई पैड में खुश्बूदार रसायन डाले जाते हैं।  पैड सफ़ेद बनवाने के लिए उसमें ब्लीचिंग एजंट डाले जाते हैं। पता चला है की इन में से कई रसायन कैंसर पैदा कर सकते हैं। यह नॅपकिन तथा टॅम्पॉन खून को अच्छा सोख लेते है मगर थोडी देर बाद उनमें किटाणू बढ़ने लगते हैं और बदबू भी आने लगती है। कप अंग्रेजी U(“यू“) अक्षर की तरह मोड़ कर योनिमार्ग में ड़ालकर थोड़ा घूमकार बिठाया जाता है। हवा की दबाव से कप हिलता नही। इसलिए चारपाँच घंटों तक स्त्राव बिलकुल बाहर नही निकलता। कप भरने के बाद हम उसे निकालके, अच्छे पानी और गंधहीन साबुनसे धो कर पुन: पहन सकती है। जब तक कप ठीक से बैठा हो और भरा ना हो, तब तक आप मासिक धर्म से जुडी चिंता को भूलकर अपने काम, पढ़ाई, खेलकूद, तैरना सब कुछ एक आम दिन की तरहा कर सकती है। एक बात जरुर याद रखना मासिक धर्म से पहले और बाद में कप को १०१२ मिनिट तक उबाले। मासिक धर्म के दौरान प्रयोग करने की यह ऐसी एक ही चीज है जिसे हम खुद पुरी तरह रोगाणुरहित कर सकती है। कप सिलिकोन या टी.पी.. से बनता है जिसकी योनी के मांसपेशी के साथ कोई रासायनिक प्रक्रिया नही होती। इसी लिए माहवारी कप,  नॅपकिन की अपेक्षा स्वास्थ के लिए काफ़ी सुरक्षित है। टॅम्पॉन और नॅपकिन के प्रयोग से होनेटॉक्सिक शॉक सिन्ड्रोमनाम की जानलेवा बिमारी हो सकती है मगर कप का प्रयोग करने वाली महिलाओं में इसका संभव बहुत कम है।

एक कप अगर ठीक से संभाल कर इस्तेमाल कर तो ५ से १० साल तक चल सकता है। फिर हर महिने नॅपकिन की जरुरत नही पडे़गी। कप की किंमत अभी ६०० से १४०० रु. तक है। यह महंगा तो है लेकिन सिर्फ़ एक कप सालों साल चल सकता है। हर महिने १०० से १५० रु. खर्च करने से अच्छा है की एक ही बार कप खरीद ले। शुरु में एकदो महिने आदत पड़ने में लग सकते है मगर उसके बाद कप इस्तेमाल करनेवाली महिलाएँ डिस्पोजेबल नॅपकिन को कभी नही छूती।

अमरिका जैसे प्रगत देशों में कई लड़कियाँ सयानी होते ही ऐसे कप का इस्तेमाल करने लगी हैं। उनके लिए छोटे साइज में कप मिलते है। कई लोग मानते हैं की कप के प्रयोग से योनि झिल्ली फट जायेगी और लडकी का कौमार्य खत्म हो जायेगा। ये बात गलत है। योनि झिल्ली खेलखूद, घुड़्सवारी या योगा से भी फट सकती है। साइंस के मुताबिक कौमार्य खत्म होना लैंगिक संबध हुआ या नही इस पर निर्भर है, झिल्ली टूटने पर नही। और एक प्रश्न पूछा जाता है, की क्या कॉपर टी लगी है तो कप का प्रयोग कर सकते है क्या? इसका जवाब बहुत आसान है– “हां क्यों कि कॉपर टी गर्भाशय के अंदर होती है और कप योनिमार्ग में। कॉपर टी लगने के दोतीन माह बाद कप का प्रयोग करने में कोई हर्ज नही। उसी तरह जचकी (डिलीवरी) से कुछमहिनों बाद कप का प्रयोग हो सकता है।पर इसविषय में डॉक्टर की सलाह लेना उचित रहेगा।

आजकल नॅपकिन जलाने के लिएइन्सिनरेटर्सलगाये जा रहे है। ऐसा कहते है की उनमें नॅपकिन जलाकर खाक हो जाते है और बची हुई राख खेतों में डाली जा सकती है। मगर गौर से देखा जाये तो समझ में आता है की इसे चलाने में बिजली चाहिए और जो भी वायू निकलेंगे उनमॆं कार्बन डाय ऑक्साईड़ तो जरुर होगा। तो हर पैड के पीछे कितना खर्चा और प्रदूषण बढ़ रहा है।

इसके बजाय एक कप और साथ में जरुरत पड़े तो कपडे का पैड़ इस्तेमाल कर हम भूमी का कुछ तो बोझ कम कर सकते है। हमारे कचरे की व्यवस्था हम ही कर सकते हैं। अब तो बहुत ही आकर्षक रंगो मे और प्रेस बटन लगे हुए सुती पैड़ बाजार में उपलब्ध हैं। छोटी लडकियाँ जो अभी अभी सयानी हो हुई है वह आसानी से ऐसे पैड का प्रयोग कर सकती है। कप अगर ठीक से लगाए तो और किस चीज की जरुरत भी नही पड़ती। कभी कभी महिलाएँ कहती हैं की कप थोड़ा गलता है। इसके लिए सही प्रकार का कप चुनना चाहिए। इन सबकी जानकारी तथा कई सारे यूट्युब विडीयो, ब्लॉग इंटरनेट पर हैं।कप और सुती पैड़ अभी तो सिर्फ़ इंटरनेट पर ही मिलते है अगर दवाई की दुकानों में मिलने लगे तो अच्छा होगा।

इस साल, ३१ जनवरी को मेरी कुछकप प्रेमीसहेलियों ने बंगलोर के पिंकॅथॉन इस महिलाओं के दौड में मेस्ट्रुअल कप का प्रचार करने की ठानी। यह दौड स्तन कैंसर पर संशोधन, गरीब स्त्रियों का उपचार, आदि के लिए निधी इकठ्ठा करने हेतु कार्यरत है। पिंकॅथॉन भारत की महिलाओं के लिए एक अनूठी दौड़ है। और स्त्री जागरुकता की दिशा में यह एक क्रांतिकारी कदम है। इस दौड़ के आयोजक है सुविख्यात मॉडल, क्रिडावीर – “मिलिंद सोमण हम पाँच महिलाएँव्हाय व्हिस्पर व्हेन यू कॅन टॉक!”  “थिंक आऊट ऑफ़ द कपऐसे मजेदार स्लोगन लगे बैनर्स लगाकर ५ से १० कि.मी. दौड़े। खिलाडी महिलाओं के लिए माहवारी में दौड़ और खेलकूद में कठीनाई महसूस हो सकती है मगर मेरी एक ४२ कि.मी. मॅरेथॉन दौडने वाली सहेलीशिल्पी साहूने मुझे बताया की वो तो माहवारी में भी अपनी प्रॅक्टीस जारी रखती है। उस दिन हमने दौड़ के बाद हमारे स्टॉल पर कप और पुन:प्रयोज्य सुती कपडे के पैड़ के बारे में कई महिलाओं को जानकारी दी। उसके बाद हैदराबाद और गोवा में भी इस प्रकार के कार्यक्रम हुए। दोनो जगहों में सैकडो महिलाओं से हमने संवाद स्थापित किया। इस दरम्यान फ़ेसबुक परसस्टेनेबल मेन्स्ट्रूएशन इंडियाइस ग्रूप की मैं सदस्या बनी। इस ग्रूप पर केवल महिलाए होती हैं और वे कप और पुन:प्रयोज्य पैड़ के बारे में अपने अनुभव बताती हैं। इस ग्रूप की सदस्य संख्या अब सात हजार के उपर गयी है और अब बहुत सारी महिलाएँ इसके बारे में जागरुक होने लगी है। मेरा कपप्रेमी सहेलियों का परिवार बढ़ते जा रहा है। जो भी सहेली कप प्रयोग करने लगती है, वो दूसरों को बताने लगती है। चलो यही सही।

कई महिलाओं के लिए यह सब नया हो, पर कप का खयाल सौ साल से भी पुराना है।  १९८० में रबर से बनाद कीपरकप आया व अभी भी मिलता है। इक्कीसवी शताब्दी की शुरुवात में मेडीसीन दर्जे के सिलिकोन से बने कप आये। जिन्हे रबर से एलर्जी है वो महिलाएँ भी अभी कप इस्तेमाल करने लगी है। ल्युनेट कंपनी २००५ से अलग अलग तरह के कप बना रही है। भारत में माहवारी कप का निर्माण आशिष और मनीष मलाणी ये दो भाईयों ने २०१० में आरंभ किया। यहशीकपआशियाई देशों में बना पहला माहवारी कप था। महिलाओं के सेहद का खयाल रखते हुए इन दोनों भाइयों ने यह कंपनी की संस्थापना की।  इस कप को अमरिका के फार्माकोपिया ने प्रमाणित किया है और इस के सही चिकित्सकीय परीक्षण हो चुके हैं। कप हम शरीर के अंदर डालते है इसलिए उसका सही प्रमाणित होना बहुतही जरुरी है। आजकल कई सारे कप मिलने लगे है मगर कप की गुणवत्ता जाँच कर खरीदना बहुत आवश्यक है। शीकप का प्रयोग शहर और गाँव की महिलाएँ कर रही है। अमरिका के विश्व विद्यालय के विद्यार्थी  भारत में कप का प्रयोग कैसे बढ़ सकता है इस पर संशोधन कर रहे है।  बिहार में हुए एक सर्वेक्षण और संशोधन के लिये बिल और मिलिंडा गेट फाऊंडेशन की मदद हुई थी। शीकप अब सिर्फ़ भारत में ही नही बल्कि पाँचों महाद्वीपों में बिक रहा हैं यह हमारे लिए खुशी की बात है। मगर इसका प्रयोग भारत में बढ़ना हम सबके लिए महत्त्वपूर्ण है।स्वच्छ भारत अभियानके लिए इसकी सख्त जरुरत है।

प्यारी सहेलियों, यही वक्त है अंधेर नगरी में फैले कूड़े का व्यवस्थापन करने का।  हम सभी इसमें यह छोटा कदम लेते हुए योगदान कर सकती है। अब समय आया है अपने आप को बदलने काडिस्पोजेबल पैड़ यह बीसवी सदी की बात थी। एक्कीसवी सदी में आगे बढ़ते हुए माहवारी कप अपनाइये ..पर्यावरण की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाये और खुद को माहवारी की चिंता से मुक्त करें।

गौरी दाभोलकर dabholkar.gauri@gmail.com

(लोकसत्ता १९//२०१६ कथात्याकपाची (मराठी)  अनुवाद: वंदना जाजू)

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  1. कई महिलाओं के लिए यह सब नया हो, पर कप का खयाल सौ साल से भी पुराना है। १९८० में रबर से बना “द कीपर” कप आया व अभी भी मिलता है। इक्कीसवी शताब्दी की शुरुवात में मेडीसीन दर्जे के सिलिकोन से बने कप आये। जिन्हे रबर से एलर्जी है वो महिलाएँ भी अभी कप इस्तेमाल करने लगी है। ल्युनेट कंपनी २००५ से अलग अलग तरह के कप बना रही है। भारत में माहवारी कप का निर्माण आशिष और मनीष मलाणी ये दो भाईयों ने २०१० में आरंभ किया। यह “शी–कप” आशियाई देशों में बना पहला माहवारी कप था। महिलाओं के सेहद का खयाल रखते हुए इन दोनों भाइयों ने यह कंपनी की संस्थापना की। इस कप को अमरिका के फार्माकोपिया ने प्रमाणित किया है और इस के सही चिकित्सकीय परीक्षण हो चुके हैं। कप हम शरीर के अंदर डालते है इसलिए उसका सही प्रमाणित होना बहुतही जरुरी है। आजकल कई सारे कप मिलने लगे है मगर कप की गुणवत्ता जाँच कर खरीदना बहुत आवश्यक है। शी–कप का प्रयोग शहर और गाँव की महिलाएँ कर रही है। अमरिका के विश्व विद्यालय के विद्यार्थी भारत में कप का प्रयोग कैसे बढ़ सकता है इस पर संशोधन कर रहे है। बिहार में हुए एक सर्वेक्षण और संशोधन के लिये बिल और मिलिंडा गेट फाऊंडेशन की मदद हुई थी। शी–कप अब सिर्फ़ भारत में ही नही बल्कि पाँचों महाद्वीपों में बिक रहा हैं यह हमारे लिए खुशी की बात है। मगर इसका प्रयोग भारत में बढ़ना हम सबके लिए महत्त्वपूर्ण है। “स्वच्छ भारत अभियान” के लिए इसकी सख्त जरुरत है।

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